The Sem Mukhem Nagraja Temple, Uttarakhand

The Sem Mukhem Nagraja is an ancient temple dedicated to Lord Krishna (who is also known as Nagraja). The Sem Mukhem Nagraja or the temple of the king of snakes is one of the famous Nagatirthas or snake pilgrimage sites in the whole of Indian sub continent. According to the followers this is the original layer of the Nag raja. The temple complex is very sturdily built and quite old. The style used in the architecture of Sem Mukhem Nagraja temple is very familiar with the style adopted to build the revered seat of Lord Shiva, the Kedarnath Temple. The door of the temple is very religiously built. It portrays the mythological scenario in which the Nag raja is spreading out his fan while the great proprietary god, Lord Vishnu is playing his flute atop the Nag raja.


After entering the sacred sanctum through this grand gate the travelers will see the self appeared or swambhu idol of the Nag raja. The natural beauty around the temple is very alluring. It pleases the travelers and the devotees alike. The verdant natural garden and the high mountain peak all around the temple valley making the sacred temple an embodiment of peacefulness and spirituality. On the way to Srinagar from Uttarakhand there is a little town named Godalia and for here only the visitors can travel up to New Tehri from where the road to Lambgaon Lake opens up. It from this juncture onwards, the travelling to Sem Mukhem Nagraja sacred temple and religious shrine begins. The visitors from all across the country come and visit the Sem Mukhem Nagraja for offering prayers and receiving blessings.

S​hri Kashi Vishwanath Temple - Uttarkashi (Uttarakhand)

Shri Kashi Vishwanath Temple is one of the famous temples of Hindus, this temple is situated in Uttarkashi, Uttarakhand India. Shri Kashi Vishwanath Temple is one of the oldest and most sacred temples in Uttarkashi. Shri Kashi Vishwanath Temple is situated on the banks of Bhagirathi river. this temple is dedicated to Lord Shiva. This river comes from Gangotri Dham. The magnificent and picturesque landscapes of the mountains can be seen around the temple.

This temple in Uttarkashi is considered to be part of the Char Dham Yatra due to its popularity, which pilgrims visit Gangotri Dham, it certainly does the Darshan of Lord Shiva in this famous temple of Uttarkashi.



It is believed that this temple was built by Parashurama. Later, Sudarshan's wife, Maharani Khanti, rebuilt it in 1857.

Lord Shiva's Shivling is established in Shri Kashi Vishwanath temple, which is 56 centimeters tall and the direction of Shivling is towards south direction. In the sanctum sanctorum of the temple, Goddess Parvati and Ganesh are also here. In the outer room of the temple is Nandini. The idol of sakshi Gopal and Rishi Markandeya are seen represented here as in meditation.

Shakti Temple

Shakti temple is situated in front of Vishwanath temple, which dedicated to Devi Parvati. The main attraction here is a huge and heavy trident - which is about 26 feet in height, which was thrown on the devils by Goddess Durga.

The power of the mother is seen here as a huge trident, which is estimated to be triden more than 1500 years old and this Trishul is considered one of the oldest remains of Uttarakhand. It is an indication of the extensive Indo-Tibetan culture exchange of Tibetan inscriptions in ancient times. The description of the Naga dynasty is marked on the Metal Trident, which is 26 feet high, placed near the main Shiva temple.

One amazing feature of the trishul is that it cannot be moved with your entire body force but it vibrates the moment you apply pressure with one of your fingers.

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर हिन्दूओं के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है यह मंदिर उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड भारत में से स्थित है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर उत्तरकाशी में सबसे पुराना और सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर भागीरथी नदी के किनारे स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह नदी गंगोत्री धाम से आती है। मंदिर के आसपास पहाड़ों के शानदार व मनमोहक प्राकृतिक दृश्य देखे जा सकते है।

उत्तरकाशी में यह मंदिर अपनी लोकप्रियता के कारण चार धाम यात्रा का हिस्सा भी माना जाता है जो तीर्थयात्री गंगोत्री धाम की यात्रा करते है, वह उत्तरकाशी के इस प्रसिद्ध मंदिर में भगवान शिव के दर्शन जरूर करता है।

ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर परशुराम द्वारा बनाया गया था। बाद में, सुदर्शन की पत्नी महारानी खानेटी ने 1857 में इसका पुननिर्माण किया था।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित है जिसकी ऊंचाई 56 सेंटीमीटर तथा शिवलिंग का झुकाव दक्षिण दिशा की ओर है। मंदिर के गर्भगृह में, देवी पार्वती और गणेश भी विराजमान है। मंदिर के बाहरी कक्ष में नदंी है। ध्यान गोपाल और ऋषि मार्कंडेय की मूर्ति यहां ध्यान मुद्रा में है।

शक्ति मंदिर
देवी पार्वती को समर्पित शक्ति मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने स्थित है। यहां का मुख्य आकर्षण एक विशाल और भारी त्रिशूल है - जिसकी ऊंचाई में लगभग 26 फुट है जो देवी दुर्गा द्वारा शैतानों पर फेंका गया था।

मां की शक्ति को, यहां एक विशाल त्रिशूल के रूप में देखा जाता है, जिसका अनुमान यह त्रिशूल लगभग 1500 वर्ष से अधिक पुराना है और इस त्रिशूल को उत्तराखंड के सबसे पुराने अवशेषों में से एक माना जाता है। यह प्राचीन समय में तिब्बती शिलालेखों का व्यापक इंडो-तिब्बती संस्कृति आदान-प्रदान का संकेत है। नागा राजवंश का ब्योरा मेटल ट्राइडेंट पर अंकित है जो कि 26 फीट ऊँचा है, मुख्य शिव मंदिर के समीप रखा गया है।

त्रिशूल की एक आश्चर्यजनक विशेषता यह है कि त्रिशूल आपके पूरे शरीर के बल से नहीं हिलाया जा सकता है, लेकिन हाथ के एक उंगली से यह त्रिशूल हिल जाता है

पंच केदार

उत्तराखंड स्थित पंच केदार को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, केदारनाथ के अलावा यहां चार और केदार हैं जिनका धार्मिक महत्व केदारनाथ के बराबर है।

विश्व में उत्तराखण्ड को एक विशेष स्थान प्राप्त है। इसकी हरियाली भूमि को देवताओं की पवित्र भूमि का कहा जाता है। यहां विभिन्न रूप में हमारे अराध्य भगवान्, देवी देवताओं के स्थान, मंदिर स्थापित हैं। अपनी इन्हीं अप्रतिम विशेषताओं के चलते उत्तराखंड की भूमि एक तरह से हिन्दू संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। देश-विदेश में भगवान शिव के अनेकों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच केदार को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। शास्त्रों में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम का बड़ा ही महात्म्य बताया गया है। केदारनाथ के अलावा यहां चार और केदार हैं जिनका धार्मिक महत्व केदारनाथ के बराबर है, हालांकि यहां हर कोई आसानी से नहीं जा पाता पर जो जाता है वह स्वयं ही शिवमय हो जाता है। इन सभी धामों के दर्शन से व्यक्ति की कामना पूर्ण होती है। इन स्थानों में तुंगनाथ के महादेव, रूद्रनाथ, श्रीमध्यमहेश्वर एवं कल्पेश्वर प्रमुख हैं। भगवान शिव के ये चार स्थान केदारनाथ के ही भाग हैं।

शिवपुराण के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने कुल-परिवार और सगोत्र बंधु-बाँधवों के वध के पाप का प्रायश्चित करने के लिए यहाँ तप करने आये थे

शिवपुराण के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने कुल-परिवार और सगोत्र बंधु-बाँधवों के वध के पाप का प्रायश्चित करने के लिए यहाँ तप करने आये थे। यह आज्ञा उन्हें वेदव्यास ने दी थी। पांडव स्वगोत्र-हत्या के दोषी थे। इसलिए भगवान शिव उनको दर्शन नहीं देना चाहते थे। भगवान शिव ज्यों ही महिष (भैंसे) का रूप धारण कर पृथ्वी में समाने लगे, पांडवों ने उन्हें पहचान लिया। महाबली भीम ने उनको धरती में आधा समाया हुआ पकड़ लिया। शिव ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिये और पांडव गोत्रहत के पाप से मुक्त हो गये। उस दिन से महादेव शिव पिछले हिस्से से शिलारूप में केदारनाथ में विद्यमान हैं। उनका अगला हिस्सा जो पृथ्वी में समा गया था, वह नेपाल में प्रकट हुआ, जो पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। इसी प्रकार उनकी बाहु तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमहेश्वर में और जटाएँ कल्पेश्वर में प्रकट हुईं। दुर्लभ भगवान शिव के पंच केदारों के बारे में कुछ इस प्रकार से जाना जा सकता है,

केदारनाथ मुख्य केदारपीठ है। इसे पंच केदार में से प्रथम कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होने पर अपने ही कुल के लोगों का वध करने के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वेदव्यास जी की आज्ञा से पांडवों नेयहीं पर भगवान शिव की उपासना की थी। यहाँ पर महिषरूपधारी भगवान शिव का पृष्ठभाग यहा शिलारूप में स्थित है।

1. केदारनाथ-

गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर अवस्थित है देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च केदारनाथ धाम। कहते हैं कि समुद्रतल से 11746 फीट की ऊंचाई पर केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। पुराणों के अनुसार केदार महिष अर्थात् भैंसे का पिछला अंग (भाग) है। मंदिर की ऊंचाई 80 फीट है, जो एक विशाल चबूतरे पर खड़ा है। केदारनाथ जाने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार है। हरिद्वार से आगे का रास्ता सड़क मार्ग से तय किया जाता है। केदारनाथ की चढ़ाई कठिन मानी जाती है, कई लोग पैदल भी जाते हैं। केदारनाथ के लिए नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून है।

शिवपुराण के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने कुल-परिवार और सगोत्र बंधु-बाँधवों के वध के पाप का प्रायश्चित करने के लिए यहाँ तप करने आये थे। यह आज्ञा उन्हें वेदव्यास ने दी थी। पांडव स्वगोत्र-हत्या के दोषी थे। इसलिए भगवान शिव उनको दर्शन नहीं देना चाहते थे। भगवान शिव ज्यों ही महिष (भैंसे) का रूप धारण कर पृथ्वी में समाने लगे, पांडवों ने उन्हें पहचान लिया। महाबली भीम ने उनको धरती में आधा समाया हुआ पकड़ लिया। शिव ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिये और पांडव गोत्रहत के पाप से मुक्त हो गये। उस दिन से महादेव शिव पिछले हिस्से से शिलारूप में केदारनाथ में विद्यमान हैं। उनका अगला हिस्सा जो पृथ्वी में समा गया था, वह नेपाल में प्रकट हुआ, जो पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। इसी प्रकार उनकी बाहु तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमहेश्वर में और जटाएँ कल्पेश्वर में प्रकट हुईं।


गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर अवस्थित है देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च केदारनाथ धाम। कहते हैं कि समुद्रतल से 11746 फीट की ऊंचाई पर केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। पुराणों के अनुसार केदार महिष अर्थात् भैंसे का पिछला अंग (भाग) है। मंदिर की ऊंचाई 80 फीट है, जो एक विशाल चबूतरे पर खड़ा है।

2. मध्यमेश्वर( मनमहेश्वर)-

चौखंभा शिखर की तलहटी में 3289 मीटर की ऊंचाई स्थित मद्महेश्वर मंदिर में भगवान शिव की पूजा नाभि लिंगम् के रूप में की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार नैसर्गिक सुंदरता के कारण ही शिव-पार्वती ने मधुचंद्र रात्रि यहीं मनाई थी। मान्यता के अनुसार यहां का जल इतना पवित्र है कि इसकी कुछ बूंदें ही मोक्ष के लिए पर्याप्त मानी जाती हैं। मध्यमेश्वर मंदिर जाने के लिए सबसे अच्छा समय गर्मी का माना जाता है। मुख्यत: यहां की यात्रा मई से अक्टूबर के बीच की जाती है।

3. तुंगनाथ-

इसे पंच केदार का तीसरा माना जाता हैं। केदारनाथ के बद्रीनाथ जाते समय रास्ते में यह क्षेत्र पड़ता है। यहां पर भगवान शिव की भुजा शिला रूप में स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्वयं पांडवों ने करवाया था। चंद्रशिला चोटी के नीचे काले पत्थरों से निर्मित यह मंदिर हिमालय के रमणीक स्थलों में सबसे अनुपम है। तुंगनाथ शिखर की चढ़ाई उत्तराखंड की यात्रा की सबसे ऊंची चढ़ाई मानी जाती है। तुंगनाथ मंदिर सबसे अधिक समुद्रतल से 3680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

4. रुद्रनाथ-

यह पंच केदार में चौथे हैं। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव का मुख स्थित हैं। तुंगनाथ से रुद्रनाथ-शिखर दिखाई देता है पर यह एक गुफा में स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग बेहद दुर्गम है। यहां पंहुचने का एक रास्ता हेलंग (कुम्हारचट्टी) से भी होकर जाता है, यह मंदिर समुद्रतल से 2286 मीटर की ऊंचाई पर एक गुफा में स्थित है, जिसमें भगवान शिव की मुखाकृति की पूजा होती है। रुद्रनाथ के लिए एक रास्ता उर्गम घाटी के दमुक गांव से गुजरता है। लेकिन, बेहद दुर्गम होने के कारण श्रद्धालुओं को यहां पहुंचने में दो दिन लग जाते हैं। इसलिए वे गोपेश्वर के निकट सगर गांव होकर ही यहां जाना पसंद करते हैं।

5. कल्पेश्वर-

यह पंच केदार का पांचवा क्षेत्र कहा जाता है। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। अलखनन्दा पुल से 6 मील पार जाने पर यह स्थान आता है। इस स्थान को उसगम के नाम से भी जाना जाता है। यहां के गर्भगृह का रास्ता एक प्राकृतिक गुफा से होकर जाता है।। कहते हैं कि इस स्थल पर दुर्वासा ऋषि ने कल्पवृक्ष के नीचे घोर तपस्या की थी। तभी से यह स्थान कल्पेश्वर या कल्पनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रद्धालु 2134 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कल्पेश्वर मंदिर तक 10 किमी की पैदल दूरी तय कर उसके गर्भगृह में भगवान शिव की जटा जैसी प्रतीत होने वाली चट्टान तक पहुंचते हैं। गर्भगृह का रास्ता एक प्राकृतिक गुफा से होकर है।


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